शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2016

भरोसे की खोज में
परेशान वह लड़की
दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में पूर्व केन्द्रीय मंत्री जगमोहन की किताब ‘ट्रीउम्फ्स एंड ट्रेजडीस ऑफ़ नाइन्थ दिल्ली’ के लोकार्पण कार्यक्रम से लौटकर बस पकड़ने दयाल सिंह कॉलेज के स्टॉप पर आया था. सोचता आ रहा था कि दिल्ली को लेकर जो चुनौतियां दिन-ब-दिन खड़ी होती जा रही है, उसका मुकाबला संभव है? उस किताब में एक बात रेखांकित की गयी है कि दिल्ली को जिस्मानी सफाई-स्वच्छता के साथ साथ आत्मा की स्वच्छता भी जरुरी है, वह भी सिर्फ वर्तमान में नहीं, भविष्य के लिए भी.
अन्धेरा हो चुका था. लेकिन बस स्टॉप पर काफी लोग खड़े थे. देखा कि एक लडकी कुछ देर से परेशान इधर-उधर टहल रही है. वह कभी बस की तरफ लपकती तो कभी किसी ऑटो बाले से बात करने लगती. एक आदमी से रहा नहीं गया तो उसने मदद के ख़याल से पूछ लिया कि जाना कहाँ है? लेकिन लडकी ने कोई जवाब नहीं दिया. उसके चेहरे पर डर बैठा हुआ था, उससे भी ज्यादा अविश्वास का भाव था. बसें आ रही थीं, लेकिन लगा कि उसकी बस का नंबर कुछ और होगा. तब तक नई दिल्ली स्टेशन की तरफ जाने वाली बस आयी, वह उसी तरफ दौड़ी लेकिन भीड़ ज्यादा होने के कारण चढ़ नहीं पायी. उसके चेहरे पर गुस्सा और खीज के साथ अफ़सोस की लकीर भी खींच गयी. अपनी आदत के अनुसार एक ऑटो वाला उसके पास आया और चलने के लिए कहा तो वह बिफर गयी. 
स्टॉप पर खड़े ज्यादातर लोग जा चुके थे. इक्के-दुक्के रह गए थे. लडकी के चेहरे पर उलझन टंग गयी. पहले वाले आदमी ने फिर एक बार नजदीक जाकर पूछ ही लिया कि ‘बेटा, जब कोई परेशानी हो तो मदद लेनी चाहिए. बताओगी नहीं, तो कैसे पता चलेगा कि कौन सी बस जायेगी.’ उस लडकी के व्यवहार में थोड़ा परिवर्तन आया. शायद बेटी के संबोधन के कारण. वह आश्वस्त तो हुई लेकिन तब भी हिचक बरकरार थी. बातचीत से मालूम हुआ कि उसे नई दिल्ली स्टेशन जाना है. कुछ दिनों पहले ही दिल्ली नौकरी करने आयी है लेकिन दिल्ली के बारे में इतना सारा कुछ सुन-पढ़ चुकी है कि किसी पर भरोसा कर पाना मुश्किल हो रहा है. तब तक स्टॉप पर एक लडकी और आ गयी और वह वहां से खिसक कर उसके पास चली गयी. उससे बातें करने लगी. उसके साथ बातचीत साझा करने वाला आदमी थोड़ा विचलित हुआ और बडबडाया कि ‘मैंने अपनी बसें छोड़कर उसकी चिंता की ताकि वह निश्चिन्त हो कर जा सके...’
एक अन्य यात्री ने टिप्पणी, ‘एक लडकी को दूसरी लडकी मिल गयी, उसे लगा होगा कि कोई अपना आ गया. इस शहर की आवो-हवा ऐसी हो गयी है कि धुंए-धूल के प्रदूषण से कई गुना अधिक अविश्वास, डर और आशंका का प्रदूषण फ़ैल गया है.’ कुछ की करतूत ही सही, लेकिन एक धारणा तो बन ही गयी है कि दिल्ली में लडकियां सुरक्षित नहीं हैं. इसलिए तो किसी का दिया ‘अपनापन’ भी ‘आशंका’ से ग्रस्त हो गया. एकाध ने उस समय कुटिल अंदाज में फब्तियां भी कसी जो उस लडकी के कानों तक पहुँच चुकी थीं. उसके चेहरे पर फिर एक बार उदासी आ गयी. वह कुछ बोलना चाहती थी, तभी उसकी बस आ गयी थी और लडकी उधर बढ़ गयी. लेकिन बस पर चढ़ते हुए उसने निश्छल मुस्कान के साथ अपनापन जताते हुए बाय किया. बस चल पडी. मुझे जगमोहन की किताब की एक लाइन याद आ गयी कि दिल्ली की आत्मा को भी साफ़ होना होगा, सिर्फ ऊपरी चमक से काम नहीं चलेगा.  

---आनंद भारती              

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