अपना गांव बनाते लोग
वह मेरा अपना गांव है लेकिन उस गांव के साथ
सम्बन्ध क्या है, यह अब समझ में आया है. वह भी तब, जब हमारी पीढ़ी के बाद के लोगों
ने विकास की इबारत लिखने में कामयाबी हासिल की. बिहार के खगड़िया जिले का एक बहुत
उपेक्षित गांव, चोरहली, जो कोशी नदी के कटाव के कारण कई बार
उजड़ा और बसा. इस गांव की दुःख भरी दास्तान यह है
कि इसे सरकारी मदद से हर बार मरहूम रहना पडा. किसी ने भी कभी सुध नहीं ली. यहां आज
तक बिजली नहीं पहुँची है. पक्की रोड कहने के लिए है, बाँध पर ईंटें बिछा कर कच्ची –पक्की
कर दे गयी है. लेकिन उस पर बसें नहीं चलती.
उस गांव से अपने सम्बन्ध को लेकर शर्मिंदगी का अहसास
ता-उम्र रहेगा. वहां के लोगों को उम्मीद थी कि पत्रकार होने के नाते सरकार से हर
संभव मदद दिलवाऊंगा. चूंकि चौहत्तर आंदोलन के मेरे कई साथी सरकार में बैठे थे (और
हैं भी), इसलिए लोगों का भरोसा मेरे ऊपर कुछ ज्यादा ही हो गया था. जब भी गांव जाता,
सभी की अपेक्षा भरी आँखें मुझ पर टंग जाती. हालांकि
कभी किसी ने मुझे कोई उलाहना नहीं दिया. उलटे यह सुनने को मिलता कि हर कोई अपने बच्चे को मेरे जैसा पढ़ाना-बनाना चाहते हैं.
गांव का पहला एमए पास जो था मैं. इसका गर्व पूरे गांव को था.
पटना, कोलकाता, दिल्ली, चंडीगढ़, मुम्बई का जीवन जीते हुए यह भूल ही गए कि अपना
एक गांव भी है, जहां हर रिश्ता-नाता मौजूद है. घर-परिवार के लोग शादी-व्याह,
होली-दीवाली में इंतज़ार करते रहते हैं. पहले दो-चार साल में एक-दो दिनों के लिए
चला जाता था लेकिन बाद में लंबा अंतराल आ
गया. आठ-नौ साल बाद गया तो गांव का काया-कल्प देखकर हैरान रह गया. कटाव के कारण
बार बार उजड़ने-बसने का जो दुःख पहले देखा था, वह नदारद था. ज्यादातर लोगों के
चेहरे पर खुशहाली की खुशी थी. गांव के जिस भी दरवाजे पर गया, वहां बस एक ही बात
सुनने को मिली कि क्या कोई गांव-घर से दूर रहकर जी सकता है? अपने ग्राम देवता और
कुल देवता को भूल जाना सबसे बड़ा पाप है. इस गांव के काफी लोग वर्षों से दिल्ली,
बंबई, असम, पंजाब में मजदूरी कर रहे हैं लेकिन साल में एक बार ज़रूर आ जाते हैं. वे
शहर से भी जुड़े हैं और गांव से कटे भी नहीं हैं.
मैं यह जानकर हैरान हो गया कि लगभग पांच सौ घरों वाले इस गांव में दो सौ मोटर
सायकिल और खेती के लिए पचास से ज्यादा ट्रैक्टर हैं. सिंचाई का इंतजाम आपसी सहयोग
से कर लिया है. कोशी के कटाव के पहले गांव की हालत कुछ ठीक नहीं थी. गरीबी-मुफलिसी
ने क्राइम को बढ़ने का मौक़ा दे दिया था. यह गांव बदनाम हो चुका था. लेकिन जब पूरे
गांव पर संकट आया तब एक नयी सोच पनपी कि क्यों नहीं आत्मनिर्भर होने का उपाय ढूंढा
जाए. गांव ने सरकार को एक किनारे रख दिया और अपनी कोशिश शुरू कर दी. कटाव के बाद पांच
सौ घरों वाला गांव कई टुकड़ों में इधर उधर यानी टोले-मोहल्ले में बंट गया. जिसे
जहां जगह मिली, वहां अपना बसेरा बना लिया. हिन्दू-मुस्लिम की बस्ती पहले एक साथ
थी. वे अलग अलग बस गए. लेकिन एक-दूसरे से दूर नहीं हुए. सबने मिलकर बाज़ार बसाया.
सब्जी, मच्छी-मटन, फल आदि की हाट मुस्लिम इलाके में बनी और बाकी दुकानें बसाने का
जिम्मा हिन्दू बनियों को दे दिया. दरअसल सरकारी व्यवस्था की उपेक्षा के खिलाफ पनपे
असंतोष ने सबको सिखा दिया कि उन्हें खुद कुछ करना चाहिए.
आज उसी का नतीजा है कि बिजली नहीं होने के बावजूद लोग उससे वंचित नहीं हैं.
जेनेरेटरों के माध्यम से पूरा गांव बिजली
से नहा रहा है. खेती-किसानी हो या दुकानदारी, सब कुछ जिंदादिली से चल रही है. हर
घर पढने-लिखने में व्यस्त है और चाहता है कि उसके बच्चे पैसे और शोहरत कमा कर
लायें. बच्चे इंजीनियर, टीचर, पुलिसकर्मी और क्लर्क बन रहे हैं. मदरसा हो या
स्कूल, उनके सामने बच्चों का भविष्य पहले नंबर पर आ गया है. परम्परा और आधुनिकता
के बीच बनी ऐसी दोस्ती की मिशाल कम ही देखने को मिलती है. समृद्धि अब लोगों के
व्यवहार में शामिल हो गयी है.
हम भले गांव और शहर के बीच की खाई को मुद्दा बनाएं लेकिन शहर में रोजगार,
मजदूरी या अन्य काम करने वाले लोग साफ़ तौर पर कहते हैं कि आज वे जो कुछ भी हैं, वह
शहर की देन है. शहर ने न केवल काम करना बल्कि दुश्मनी को भुलाना भी सिखाया. शहर
में रहकर जाना कि काम से काम रखना और आगे बढना किसे कहते हैं. एक अजीब बात है कि
केस मुकदमे में फंसे रहने वाले लोग उससे किनारा कर रहे हैं और एक-दूसरे के
सुख-दुःख में सहभागी बन रहे हैं. यह बदलाव हर स्तर पर आ गया है. लोग गांव को अपना
गांव बनाने पर तुले हुए हैं, जहां किसी के मन में कोई गाँठ नहीं हो और वे एक-दूसरे
को मदद कर रहे हों.
---आनंद भारती
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