शनिवार, 13 जून 2020


स्कूलों के मामले में दमन बन रहा है एक उदाहरण
सरकार चाहे जितनी योजनाएं बना ले, अगर उसमें जनभागीदारी नहीं हुई तो उसकी सफलता की संभावना न्यूनतम रह जाती है. जब भी सरकार या प्रशासन के कामों में समाज और सचेतन लोगों ने अपने हाथ लगाए हैं, उसकी कामयाबी शत-प्रतिशत रही है. कामयाबी का ऐसा ही लक्षण दिखाई दे रहा है गुजरात और महाराष्ट्र से सटे केंद्र शासित प्रदेश दमन में. अरब सागर का यह द्वीप पर्यटकों के लिए स्वर्ग की तरह है. पहले यह पुर्तगालियों के अधीन था. 1961 में जब गोवा को पुर्तगालियों से मुक्त कराया गया, उसी समय दमन भी भारत का हिस्सा बना. लेकिन यह केंद्र शासित प्रदेश बना 1987 में. दमन में अपनी कोई सरकार या विधान सभा नहीं है. प्रशासक यहां का काम काज देखते हैं. दमन और दीव, दोनों जिलों की आबादी लगभग ढाई लाख है. उसमें दमन का ही लगभग दो लाख है. साक्षरता लगभग 87 प्रतिशत है.
इस साक्षरता को और भी बढ़ाने और असरकारी बनाने की कोशिश में प्रशासक प्रफुल्ल पटेल की पहल पर इंडस्ट्री एसोशियेसन ने खुलकर हाथ बढाया है. कह सकते हैं कि सरकार की योजना को कॉर्पोरेट कंपनियों का सहयोग मिल रहा है. सीएसआर यानी कॉर्पोरेट सामाजिक दायित्व का असर बढ़ने लगा है. एसोशियेशन के सदस्यों और प्रशासक के बीच हुई बातचीत आम सहमति में तब्दील हुई और यह तय किया गया कि न केवल आठवीं तक के स्कूलों को दुरुस्त किया जाए बल्कि आंगनबाडी को भी इस लायक बना दिया जाए कि छोटे-छोटे बच्चों का भविष्य सुरक्षित हो जाए. मां-बाप भी अपनी जीविका ठीक से चला सकें.
अबतक दमन के स्कूलों के परिसरों की हालत बहुत दयनीय थी. भवन टूट-फूट के शिकार थे, वहाँ टॉयलेट का अभाव था, टॉयलेट थे भी तो उसमें पानी नहीं होता था. चहारदीवारी का नामो निशान नहीं था. छतें भी बरसात में चूती रहती थीं. वह किसी भी तरह से स्कूल जैसा नहीं लगता था. इसलिए बच्चों का रुझान भी कम हो गया था. मां-बाप की कोशिश होती थी की उनके बच्चे निजी स्कूलों में जाएं ताकि अच्छे से पढ़-लिखकर बढ़िया नौकरियां हासिल कर सके. लेकिन निजी स्कूलों की भी अपनी सीमा है. उतने सारे बच्चों के एडमिशन में दिक्कतें ही दिक्कतें थी. गरीब और सामान्य परिवारों के पास इतने पैसे भी नहीं होते हैं कि वे वहां प्रवेश दिला सकें. सरकारी स्कूलों में हालांकि प्रशिक्षित टीचर हैं लेकिन उनके पास छात्र नहीं होते थे. जो भी थी वे मजबूरी में थे. स्कूलों की बदतर स्थिति के कारण पढाई का माहौल नहीं बन पाता था. प्रशासन ने पहले भी कई बार कोशिश की कि इस स्थिति को बदला जाए, लेकिन किसी न किसी कारण से परिवर्तन में देरी हो रही थी. यही हाल आंगन बाडी का भी था. अब जब कुछ महीने पहले प्रशासक ने इंडस्ट्री एसोसियेशन के सामने अपने मन की बात कही तो सीएसआर ने इसकी जरुरत महसूस करते हुए तुरंत अपनी तैयारी शुरू कर दी.
दमन की एक ख़ास बात यह है कि यहां का सांस्कृतिक जीवन का चरित्र अलग-अलग रंगों में डूबा हुआ है. एक साथ उनमें आप यूरोपीय, भारतीय और परम्परागत आदिवासी तत्वों के दर्शन कर सकते हैं. अंगरेजी, हिंदी, कोंकणी, गुजराती के साथ-साथ पुर्तगाली भी सुन सकते हैं. लेकिन अब उत्तर भारतीय मजदूरों की संख्या में बढ़ोत्तरी के कारण उनकी बोलियां भी भरपूर बोली जा रही हैं. परंपरा और रिवाज पर गुजरात का प्रभाव है. यहां के मूल लोग मछलियों का व्यवसाय करते थे लेकिन अब उद्योगों का जाल बिछ जाने के कारण लोग कारखानों की शरण में पहुँच चुके हैं. उनके लिए प्रशिक्षण के इंस्टीच्यूट भी खुल गए हैं. नौजवानों का भी रुझान बढ़ा है. वे नौजवान पहले ठीक से पढ़-लिख सकें उसके इंतजाम की बात सोची गयी. कहा गया कि इसके लिए पहले स्कूल को मजबूत करने का काम किया जाए. उस दिशा में पहल शुरू हुई.  
यह काम दोहरे स्तर पर किया जा रहा है. एक तो आंगनबाड़ी को घर का रूप दिया जा रहा है. उसे प्रधानमंत्री ने ‘नंद घर’ का नाम दिया है. यानी हर बच्चे को कृष्ण के रूप में देखा जाए और उसे नंद जैसा अभिभावक मिले ताकि उसका पालन-पोषण सही तरह हो सके. कारखानों में काम करने वाले मजदूर या मछली का व्यवसाय करने वाले पति-पत्नी निश्चिन्त होकर अपने बच्चे को पालने-घर में छोड़ सकें. उन बच्चों के खाने आदि की सारी व्यवस्था को मजबूती दी जा रही है. उस पालने-घर या नंद-घर को इस तरह से सजाया-संवारा जा रहा है कि बच्चों को कोई परेशानी नहीं हो. उनके खेलने-कूदने और मन लगाए रखने के लिए सभी आवश्यक साधन उपलब्ध कराए जा रहे हैं. यह घर नर्सरी स्कूल की शक्ल में भी है ताकि जब स्कूलों में एडमिशन हो तो पीछे न रह जाएं. इसमें दो से चार साल तक के बच्चे पलते हैं. यानी स्कूल जाने से पहले तक की बुनियादी जानकारियां उन्हें यहीं मिल जाएँगी. प्रशासक पटेल के अनुसार, ‘प्रधानमंत्री ने इसे नंद घर का नाम दिया है इसलिए हमारी जिम्मेदारी है कि उसे उस अनुरूप बनाया जाए.  हर मां-बाप समझें कि उनका बच्चा कृष्ण की तरह ही पल रहा है. मैंने यह बात इंडस्ट्री एसोशियेशन के सामने रखी. मुझे खुशी है कि उसने अपनी सामाजिक जिम्मेदारी को समझते हुए अपना हाथ बढ़ा दिया.’
उल्लेखनीय है कि दमन में प्राइमरी स्कूलों की संख्या 36 है, जहां दो शिफ्टों में पढाई होती है. उन खस्ता-हाल स्कूलों में अधिकाँश को को आधुनिक रूप दिया जा चुका है और बाकी को भी उसी तरह सुसज्जित किया जा रहा है. पंखे, बिजली, लाईट, टॉयलेट, साफ़ सफाई की हर व्यवस्था हो रही है. वे स्कूल अब पढाई और सुविधा के मामले में निजी स्कूलों को पीछे छोड़ रहे हैं. यहां का आकर्षण भी बढ़ा है. ख़ास बात यह हुई है कि कल तक जो बच्चे निजी स्कूलों के बच्चों के मुकाबले खुद को कमतर समझते थे वे आज सीना तानकर चल रहे हैं. इससे गरीब बच्चों में आत्मविश्वास भी बढ़ा है. उनमें पढने की ललक भी पैदा हुई है. इंडस्ट्री की सहभागिता के कारण स्कूल और उसके आंतरिक ढाँचे को सुधारने में मदद मिली है. यह एक बड़े उदाहरण के रूप में देखा जा रहा है. उम्मीद की जा रही है कि ऐसा ही प्रयोग दुसरे राज्यों में भी होगा. सरकार की तरफ ताकने की प्रवृत्ति खत्म होगी और यह कहने-सोचने की आदत भी ख़त्म होगी कि ‘देश का कोई हिस्सा विकास की बाट जोह रहा है.’ हर सक्षम आदमी कायदे से समाज की समस्या का हल ढूँढने का प्रयास करेगा.
---आनंद भारती    



‘लखपति किसान, स्मार्ट विलेज’
आदिवासी महिलाएं स्मार्ट गांव के सपने को कर रही हैं पूरा

कश्मीर को छोड़कर अगर देश के बाकी हिस्सों की अशांति को कदम-कदम नापने की कोशिश करें तो वे भू-भाग आदिवासी क्षेत्र के ही होंगे। महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडीशा, झारखंड आदि राज्यों के आदिवासी इलाकों में भय और आतंक की खेती पूरी शिद्दत के साथ की जा रही है। इसके सबसे ज्यादा शिकार भी आदिवासी ही हो रहे हैं। उनपर दोहरी मार पड़ रही है। आतंकी संगठनों की अपनी राजनीति है और व्यवस्था की अपनी रणनीति। जल, जंगल और जमीन के मालिक ‘गरीब’ आदिवासी आज भी आदमखोर व्यवस्था से अपने ही संसाधनों के लिए लड़ रहे हैं। हजारों साल पहले भी वे अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे थे और आज भी कर रहे हैं। उसी में से वे अपना रास्ता भी ढूंढते रहे हैं। ऐसा ही रास्ता झारखंड के खूंटी जिले के मोरहू प्रखंड के लोग खोज चुके हैं और बाकी आदिवासी अंचलों को अपनी ओर आकर्षित कर रहे हैं।
समाजशास्त्रियों ने माना है कि हजारों वर्ष पूर्व आदिवासियों ने ही जंगल, पहाड़ एवं पहाड़ की गुफाओं में जीवन सुरक्षित करते हुए ‘विकास’ की नींव रखी। जंगलों को साफ किया और खेती करने की पद्धति इजाद कर एक स्थायी सामाजिक जीवन की शुरुवात की। यही वज़ह है कि वे  जल, जंगल और ज़मीन से अलग नहीं रह पाये। आज मोरहू प्रखंड के पांच पंचायतों में 41 गांव के लोग, खासकर स्त्रियां, यह साबित कर रही हैं कि वे श्रम के साथी हैं और किसी के बहकावे में आए बगैर खुद के साथ-साथ समाज को खुशहाल करना चाहती हैं। यह नरेंद्र मोदी सरकार के लिए भी खुशी की खबर है कि आदिवासी महिलाएं उनके स्मार्ट गांव के सपने और संकल्प को साकार कर रही हैं।
खूंटी मुंडा आदिवासियों का इलाका है। मुंडा लोगों का जमीन से जुड़ाव है। हमेशा से वे इसके लिए संघर्ष करते रहे हैं। बिरसा मुंडा ने तो इसके लिए लंबा संघर्ष किया था। उनके आन्दोलन के सामने अंग्रेज सरकार को झुकना पडा था। जमीन को लेकर उन्हें क़ानून बनाना पडा जिसे ‘छोटानागपुर टेनेंसी एक्ट’ का नाम दिया गया। लेकिन दुर्भाग्य कि खूंटी की जमीन किसी का पालन नहीं कर पा रही है। पठारी अंचल के कारण खेती करना मुश्किल है। इस कारण वहां से लोगों का शहरों की ओर पलायन करना एक रूटीन बन गया।
लेकिन तीन साल पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस स्मार्ट गांव की परिकल्पना की, उसे आज  बखूबी जमीन पर उतारने का काम मोरहू प्रखंड की महिलाएं कर रही हैं। ढाई हजार आदिवासी परिवार राज्य प्रदत्त सुविधाओं को व्यवस्थित कर एक मुकाम देने की कोशिश में लगे हुए हैं। इसके पीछे की ताकत बना रतन टाटा ट्रस्ट और उसे अंजाम पर पहुंचाने का जिम्मा लिया उस इलाके में सक्रिय संगठन नवजागृति केंद्र ने। महिलाओं को ही आधार बनाकर उसमें महिला-समूहों को जोड़ा गया। उन्हें कृषि के अत्याधुनिक तकनीक और तौर-तरीकों से अवगत कराया गया। मिट्टी रहित पौधा तैयार कर उसे रोपने का सिलसिला शुरू किया गया। ऐसा इसलिए क्योंकि मिट्टी में बीज से पौधा तैयार करने में मिट्टी की बहुत सारी बीमारियां आ जाती हैं। मिट्टी के बदले नारियल के छिलके का डस्ट डालकर पौधा उगाया जाता है। अनुभव में आया कि इससे उत्पादन भी ज्यादा हुआ। टमाटर, हरी मिर्च,गोभी आदि का ऑफ़ सीजन खेती हो रही है और कीमत भी ज्यादा मिल रही है। पहले यहां तरबूज की खेती नहीं होती थी लेकिन अब भारी मात्रा में तरबूज, ककड़ी, कद्दू आदि की फसल उगाई जा रही है। आर्थिक दृष्टि से यह वरदान साबित हो रही है। महिलाएं फलदार वृक्ष की ओर भी उन्मुख हुई हैं जो मुनाफे का बाजार कायम करेगी। सिंचाई की व्यवस्था आधुनिक कर दी गयी है। पांडु गांव में तो सोलर सिस्टम से सिंचाई की जा रही है। कुआं श्रमदान से बनाया गया है।   
उस इलाके में पारम्परिक लाह के उत्पादन को बढाने के लिए वैज्ञानिक पद्धति अपनाई गयी। लाह का सबसे ज्यादा इस्तेमाल पेंट बनाने में होता है। उससे बटन भी बनते हैं। लाह की खरीद-बिक्री में पहले बिचौलिए की मन-मर्जी चलती थी लेकिन अब आदिवासियों ने कृषक उत्पाद संगठन (फार्मर्स प्रोड्यूसर्स ओर्गेनाजेशन) बनाकर अपनी व्यवस्था बना ली है। इसमें विभिन्न महिला समितियों की प्रतिनिधि शामिल हैं। अब लाह बेचने किसी को भी बाज़ार नहीं जाना पड़ता है, महाजन ही गांव आने लगे हैं। इंटरनेट पर सक्रियता के कारण महिलाओं को हर चीज का बाज़ार-भाव मालूम रहता है इसलिए ठगी से बच जाती हैं और इन्हें अच्छी कीमत मिल जाती है।
नवजागृति केंद्र के संस्थापक सतीश गिरिजा बताते हैं कि ‘आदिवासियों का जमीन के प्रति लगाव तो शरू से ही रहा है लेकिन तकनीकी जानकारियों के अभाव में कृषि इनके जीवन का आधार नहीं बन पाया था, अब उसमें बदलाव हो रहा है। कृषि को बेहतर रूप देने की कोशिश चल रही है।’ एक प्रमुख महिला जिनित मिंज का खाना है कि ‘सरकार ने हमें सुविधाएं उपलब्ध कराई और हमने उसमें अपना श्रम लगाया। अब हमलोग खुद अपने पैरों पर खड़े हो रहे हैं। हमारी सफलता अब दूसरे क्षेत्रों को प्रेरित कर रही है।’
पहले इस क्षेत्र में कृषि के लिए बैंकों से कर्ज लेने की मंशा और परम्परा नहीं थी लेकिन जानकारियों के बाद समझ में आ गयी है कि कर्ज लेकर खेती को समुन्नत किया जा सकता है। लोग पंचायत से प्राप्त संसाधनों का भी इस्तेमाल कर रहे हैं। मनरेगा भी मददगार बन रहा है। सुअर पालन पहले पारम्परिक तरीके से होता था, अब अच्छे नस्ल के सुअर को बेहतर रख रखाव के साथ पाला जा रहा है। उसके लिए अलग से घर बनाए गए हैं और उसे बाहर नहीं छोड़ा जा रहा है। सुअरों को भूसे और साग तथा सब्जी के छिलके खिलाए जा रहे हैं। एक परिवार को दो सुअर, नर और मादा, उपलब्ध कराए जा रहे हैं। साल में दो बार उसके 12 से 16 बच्चे होते हैं। एक बच्चा ढाई हजार रुपए में बिकता है। यह किसानों की नकदी आमदनी (कैश क्रॉप) है। इन गांवों की सबसे ख़ास बात यह है कि अपनी आमदनी का हिसाब-किताब महिला समूह ही रखता है।
इन गावों को इंटरनेट से जोड़ दिया गया है। इसके लिए ‘इंटरनेट मित्र’ का आरम्भ किया गया है। हर महिला न केवल इसका इस्तेमाल कर रही है बल्कि देश-दुनिया से अपनी तरह से परिचित हो रही है। मनोरंजन के भी पर्याप्त साधन प्राप्त हो गए हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि आधुनिक तकनीक ने उन्हें अपनी परंपरा से काट दिया है बल्कि उन्होंने अपनी भाषा, संस्कृति और सामाजिक परम्पराओं को आधुनिक नज़रिए से देखना शुरू कर दिया है।
इन गांवों में जो प्रोजेक्ट चल रहा है, उसका नाम दिया गया है ‘लखपति किसान, स्मार्ट विलेज’। आर्थिक मजबूती के कारण लोगों के व्यवहार में भी परिवर्तन आ रहा है। झारखंड का अधिकांश हिस्सा नक्सल से प्रभावित है लेकिन यह माना जा रहा है कि जैसे ही लोगों की आमदनी बढ़ेगी और दूसरों पर से निर्भरता ख़त्म होगी, नक्सल का प्रभाव कम होता जाएगा। एक और बड़ी ख़ास बात यह है कि यहां से लोगों के पलायन पर ब्रेक लग रहा है। उल्लेखनीय है कि रोजगार की तलाश में बाहर जाने वालों में सबसे ज्यादा खूंटी की ही लडकियों के आंकड़े हैं। गांवों में बेहतर सुविधाएं हासिल हो रही हैं। आमदनी के कारण पक्के मकान बनाए जा रहे हैं। सरकारी सहयोग से शौचालयों के निर्माण हो रहे हैं। स्वच्छता की जिम्मेदारी स्त्रियां ही देख रही हैं। जिन स्कूलों में शिक्षक नहीं आ रहे थे, वहां की व्यवस्था दुरुस्त कर दी गयी है।
सबसे खुशी की बात यह है कि ग्रामीण विकास मंत्रालय की हैदराबाद स्थित एक विंग राष्ट्रीय ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज संस्थान झारखंड के इन गांवों में दिलचस्पी दिखाई है। वह इसका डाक्यूमेंटेशन कर रहा है ताकि पूरा देश देख सके कि कैसे बदल रहा है गांव।
---आनंद भारती  



दुनिया मेरे आगे / आनंद भारती
समझ की सीढियां
किसी भी बात को समझाने का हर किसी के पास अलग-अलग तरीका होता है। उसे पक्का भरोसा होता है कि वह समझाने में सफल होगा। लेकिन अक्सर ऐसा होता है कि स्कूल-कॉलेजों में छात्र किसी टीचर को तुरंत फ़ॉलो कर लेते हैं और किसी-किसी के क्लास में पल भर भी मन नहीं लगा पाते हैं। बचपन में गांव में मास्टर जी ना-समझ बच्चों को बाला खींचकर थप्पड़ मारते थे। तब कहा जाता था कि बुद्धि बाल के नीचे होती है। बाल खींचने से जब तकलीफ होगी तो सोई बुद्धि की नींद टूटेगी।  
इसका दूसरा पक्ष यह भी है कि अगर कोई समझने के लिए ही तैयार न हो तो उसका क्या करें।  यह भी हो सकता है कि उसका दिमाग इतना कुंद हो कि कितना भी समझाओ उसकी समझ में नहीं आता हो। समाज में इसे लेकर अलग-अलग मान्यता है कि लोग प्यार की नहीं, जबरदस्ती की भाषा समझते हैं। कोई कहेगा उसे सिर्फ डंडे की भाषा समझ में आती है या कहेंगे उसे क़ानून की नहीं, थर्ड डिग्री की भाषा समझाओ, तभी समझ पाएगा। कोई किसी बात को अगर तुरंत कैच कर लेता है तो कहा जाता है कि इसका आइन्स्टीन जैसा दिमाग है और जो अपना सर खुजलाने  लगता है उसे तत्काल ‘गोबरदास’ की उपाधि मिल जाती है। ऐसे लोगों के लिए एक मजाक भी है कि चुटकुला सुनने के बाद गधे को अगले दिन हंसी आती है। यानी इस मामले में भी हर किसी की समझ अलग-अलग है। जितने मुंह उतनी बातें।  
गांव में मेरे गाडीवान थे लसंतु चाचा। उन्हें किसी भी बात को समझने में काफी वक्त लग जाता था। लेकिन उनके पास किस्से-कहानियों का खजाना होता था। हमलोग बैलगाड़ी से ही कहीं जाते-आते थे। वही यातायात का एकमात्र साधन थी। लासंतु चाचा किस्सों का पिटारा खोल देते थे और हमारा रास्ता आसानी से कट जाता था। हमने एक बार उनसे पूछा कि इतनी कहानियां आप याद कर लेते हैं लेकिन किसी की बात समझने में देर क्यों लगती है? तो कहा, एक बार स्कूल में मास्टर जी ने कान पर जोर का थप्पर मार दिया था, जिससे कान का चदरा फट गया।  उसी के बाद से सुनने में दिक्कत होने लगी और दिमाग भी भोथा हो गया। अगर नहीं मारे होते तो हम भी पढ़-लिखकर समझदार हो गए होते, यह गाड़ीवानी का काम तो नहीं करते। लासंतु चाचा समझ की बात कर रहे थे लेकिन उन्हें इसका भान नहीं था। वे आज अगर होते तो मैं उन्हें यह समझा पाता कि फणीश्वरनाथ रेणु अपनी जिस मुहावरेदार भाषा के धनी बने, वह उन्होंने अपने गाड़ीवान से ही सुनकर जाना था।  
पिछले दिनों मुंबई के जहांगीर आर्ट गैलरी में एक पेंटिंग्स प्रदर्शनी देखने गया। सुमित मिश्रा की थी, जो इस समय सिनेमा-टीवी के बड़े आर्ट डायरेक्टर हैं। उन्होंने एक फिल्म का भी निर्देशन किया है, ‘अमृता और मैं’। अमृता प्रीतम और इमरोज की प्रेम कहानी पर बनी यह फिल्म अभी तक एक दर्जन से भी ज्यादा अवार्ड हासिल कर चुकी है। उस प्रदर्शनी को देखकर मैं बाहर निकला था। लेकिन भारी बारिश के कारण पोर्टिको में खडा हो गया। वहीं बिहार से आए कुछ पर्यटक भी थे जो गेट वे ऑफ़ इंडिया को देखकर लौट रहे थे। मेरे हाथ में एक्जीविशन का ब्रोशर था। उसके कवर पर जो चित्र था, उसमें एक आदमी के सिर पर चोटी की जगह पेड़ था। उसका शीर्षक ‘बोधिवृक्ष’ दिया गया था।  
मेरे बगल में खड़े दो बच्चे उस चित्र को देखकर हैरानी से मुस्कुरा रहे कि कैसा अजूबा है यह।  मेरे कुछ कहने के पहले ही गार्ड ने अन्दर जाकर देखने का इशारा कर दिया। दोनों डरते-हिचकते गए। पीछे-पीछे मैं भी गया। उन्होंने बाकी चित्रों को तो देखा लेकिन ‘बोधिवृक्ष’ वाली पेंटिंग के सामने टिक कर खड़े हो गए। एक ने हैरानी जतायी कि ‘इसके माथे पर गाछ कैसे उग गया है? लगता है कि यह कोई साधु होगा जो ज्ञान के लिए तप करने जंगल गया होगा। भूखे-प्यासे पता नहीं, कितना दिन बीत गया होगा। उसी में पूरे शरीर पर झाड-झंखार उग गया होगा।’ दूसरे ने बताया कि उसके गांव के पास बोधगया में बोधिवृक्ष है, जहां भगवान् बुद्ध को ज्ञान मिला था।  वह तो जमीन पर है लेकिन यहां सिर पर क्यों है? इसका मतलब यह है कि जिसका माथा सही रहेगा, उसी को बुद्धि-ज्ञान मिलेगा। फिर दोनों मेरी तरफ मुखातिब हुए थे कुछ जानने के लिए।  लेकिन मैं कहीं और देखने का नाटक करने लगा था।
मुझे लगने लगा कि बच्चों की समझ सोशल मीडिया और टीवी चैनलों पर भड़ास निकालने वालों की समझ से बहुत आगे और समझदारी भरी है। वैसे ऐसी समझ अमूमन हर किसी के पास होती है लेकिन आग्रहों-दुराग्रहों के कारण मूल चेतना से भटक जाते हैं। इन बच्चों की तरह अगर हम सही नज़रिए से चीजों को देखना शुरू कर दें तो हमारे आस-पास के माहौल में बदलाव आने लग जाएगा।   
             



खुद को पहली बार पहचाना मजदूरों ने
कोरोना ने भले हाहाकार पैदा कर जीवन-मृत्यु का रहस्यमय खेल खेला हो लेकिन उसने समाज के सबसे उपेक्षित समूह, मजदूरों, को पहली बार खुद की तरफ देखने की दृष्टि दे दी। सैकड़ों वर्षों से जिस आत्मदृष्टि की बात शास्त्र और संत करते रहे हैं, उसे एक वायरस ने चुटकी बजाते कर दिया। बाबा लोगों को कितनी सफलता मिली है, इसका एकाध प्रमाण भी खोज पाना मुश्किल है। लेकिन कोरोना की सफलता के प्रमाण सामने हैं। सैकड़ों मील पैदल चलकर अपने गांव जाने का फैसला, शहरों की सड़कों पर अपने घर जाने का बेताबी भरा गुस्सा का फूटना, सरकार को रेल-बस चलाने के लिए मजबूर करने का साहस और फिर कभी न लौटने की मंशा जाहिर कर सरकारों, बिल्डरों और कारखानेदारों के चेहरे पर चिंता की गहरी लकीरें खिंचना, उसी प्रमाण की पुष्टि है कि मजदूरों ने खुद की ताकत को पहचान लिया है।
अब तक वे मजदूर फैक्ट्री, बिल्डिंग, हाईवे, रेल लाईन, मेट्रो, बांध, पुल को देखने के अभ्यासी थे। इसलिए कि ये सारी चीजें उनके जीने के उपादान हैं। इसके लिए वे अपने घर-परिवार, गांव-जवार, प्रदेश की सरहदों को लांघने में देर नहीं लगाते। एक कोई रवाना होता कि उसके पीछे प्रवासी पंछियों की तरह लोग कतार में शामिल जाते। जहां जंगल-नदी (काम) दीख जाता, वहीं मजदूर लोटा, थाली और थैला रख देते। महीना और दिन की गनती करना वे मानो भूल ही जाते। उन्हें बस इतना याद आता कि परिवार को खुशहाल बनाना है। देश के विकास में वे भी भारी योगदान दे रहे हैं, यह उन्हें पहले किसी ने भी नहीं बताया। अब पता चला कि उनके एक ना से कैसे देश की पूरी अर्थ-व्यवस्था के चेहरे पर मुर्दनी छा गयी है।   
शहरों को विकास चाहिए, विकास को ठेकेदार, ठेकेदार को मजदूर नामक प्राणी चाहिए और मजदूरों को पैसे। उन मजदूरों को जिस भी हाल में रखिए, वे चूं तक नहीं करते। शिकायत नाम की चीज तो उनके खाते में इसलिए नहीं होती कि उनकी छवि मजबूर और असहाय की बनाई गई है। वे उसी छवि के साथ जीने के लिए विवश होते हैं। अस्थाई रूप में बनी छोटी-छोटी कोठरी या दड़बे में कोंच-कोंचाकर रहने के बाद भी उनके चेहरे पर शिकन नहीं होती है। जो लोग किराए की खोली में रहते हैं, उनकी स्थिति का बयान एशिया की सबसे बड़ी झुग्गी बस्ती धारावी ने खुले आम कर ही दिया। उसने यह भी बताया कि आज के परम आधुनिक युग में भी गरीब-मजलूमों की हैसियत क्या है? लेकिन शहर ऐसा आकर्षण का केंद्र बन गया है कि किसी तरह गुजर कर रहे लोग भी न गांव लौटने का मन बना पाते हैं और न वे उनलोगों को रोक पाते हैं जो गांव से पलायन के लिए परेशान रहते हैं। वे तो व्यवस्था और पूंजी-वर्ग के मकड़जाल में कैद हैं। यह मकड़जाल हमेशा समझाता रहता है कि अगर सुखमय जीवन जीना है तो गांव-घर का मोह छोड़ना होगा। मजदूर-बहुल राज्य सरकारें भी कभी इन्हें रोकने का प्रयास नहीं करती हैं। उन्हें पता है कि अगर ये मजदूर रह गए तो रोजगार न मिलने का असंतोष पनप जाएगा, जिसे संभालना आसान नहीं है। उन सरकारों के पास एक अद्भूत सकारात्मक नज़रियाहै कि बाहर से कमाकर ये मजदूर राज्य का ही फायदा पहुंचाते हैं। यह जो हर्रे लगे न फिटकरी, रंग चोखा होय वाली नीति है, इसने समाज के एक बड़े हिस्से को दारु का चखना जैसा बना दिया है। इसी ने छोटे किसानों और मजदूरों को हमेशा कंगाल बनाए रखा है। 
इस सच से कौन इंकार कर सकता है कि खेती कभी भी आमदनी की गारंटी नहीं रही है। खेती से लागत खर्च का भी निकलना कभी-कभी मुश्किल हो जाता है। यही वज़ह है कि छोटे किसान खेती से ज्यादा मजदूरी को लाभप्रद मानने लगे हैं। मनरेगा उनका प्राथमिक साधन बन गया है लेकिन वह साल भर तक रोजगार नहीं देता है। इसलिए लोग शहर का रुख कर लेते हैं ताकि दिहाड़ी करके अपना और परिवार का गुजारा कर सकें। पेट भर जाए, यह उनका सपना होता है। इसी सपने को पूरा करने के लिए वे अपने घरों को पीछे छोड़ आते हैं। लेकिन इस बार लॉक डाउन यह अहसास दिलाने में कामयाब रहा कि बे-घर होना कितना बड़ा अभिशाप है। यह भी समझा दिया कि तुम्हारे बिना विकास का कोई भी कार्य न शुरु होगा और न पूरा। इसलिए अपनी कीमत पहचानो और आंखें खोलकर दुनिया के साथ-साथ खुद को भी देखो।
वे काम पर लौटेंगे या नहीं, इस सवाल पर सबके अलग-अलग मत हैं लेकिन लॉक डाउन का निचोड़ यह है कि इन मजदूरों के जीवन की परवाह अगर सही मायने में संप्रभू वर्ग, अफसरों  और व्यवस्था को होती तो ये अपना सब गंवा कर भाग नहीं रहे होते। जगह-जगह अटके  मजदूरों ने सामूहिक चिंता के साथ उदास आवाज में एक प्रचलित राजनीतिक नारे को अपना बनाते हुए कहा आधी रोटी खाएंगे लेकिन अपने परिवार के साथ गांव-घर में ही समय बिताएंगे। हालांकि जहां-तहां इन मजदूरों को सुविधाओं का लालच देकर रोकने की कोशिश की गई लेकिन वे एक ही रट लगाते रहे कि एक बार अपने गांव हो आना चाहते हैं। कुछ स्थानों पर मजदूरों को जब कुछ और सुविधाएं देने की पेशकश की गयी तो उन्होंने आशंका जाहिर की कि यह नई सुविधा उन्हें मात्र रोकने के लिए तो नहीं है?  
गांव लौटने की जो यह नई चेतना है, यह कौन सा रूप लेगी, कुछ स्पष्ट नहीं है। लेकिन उन्हें इतनी समझ तो आ ही गयी कि वे हमेशा अंधेरे में हाँके जाते रहे हैं। इसलिए उन्हें न तो रास्ते का पता चलता है और न गंतव्य का। लेकिन अब जगह-जगह से जो संकेत आ रहे हैं, वे नए समय के दरवाजे पर दस्तक जैसे हैं। लेकिन मुश्किल यह है कि इन मजदूरों का कोई संगठन नहीं है जो उनकी इस सोच को जन-संघर्ष में बदल सकें या तथाकथित विकास के रथ पर सवार होकर अपने श्रम का उचित कीमत वसूल कर सकें। हालांकि गांवों को समझने वाले विशेषज्ञों का मत है कि कोरोना-भय के खत्म होने के बाद मजदूर एक बार फिर लौटेंगे मगर उतनी तीब्रता नहीं होगी। जो लोग रह जाएंगे, उनके लिए आगे चलकर एक समस्या पैदा होगी कि वे अपने गांव में करेंगे क्या? तकलीफों के बावजूद शहर जो तसल्ली और स्वाद देता है, उसे भूल पाना आसान नहीं होता। कोरोना के बीच-बीच में जब शांति का सस्वर पाठ होगा और देश के विकास के नाम पर नए मुहावरे गढ़े जाएंगे, तब कितने लोग अपने आपको रोक पाएंगे?
सबसे खतरनाक स्थिति तो यह है कि असंगठित मजदूरों के लिए कोई ठोस नीति नहीं बनाई गई है। वे भगवान भरोसे हैं। सरकारों के पास एक ही अचूक इलाज है कि इन्हें संतुष्ट करने तक बीच-बीच में राहत देते रहो। वे भी खुश हो जाएंगे और व्यवस्था की नींद में खलल भी नहीं पड़ेगी। वह आश्वस्त है कि सातवें और आठवें दशक में बंगाल, तेलंगाना, बिहार (झारखंड), मध्य प्रदेश (छत्तीसगढ), महाराष्ट्र आदि राज्यों के कुछ हिस्सों में जन-संघर्ष की फैली चिंगारी जब आग नहीं बन सकी तो अब क्या होगा? यह जो सुविधाजनक सोच है, ‘दीया और शास्त्रों तले भयानक अंधेरा होता है मुहावरे का नया राजनीतिक संस्करण है। अंधकार चलता रहता है। व्यवस्था उस अंधकार को गहरा करने के लिए अपनी आंखें बंद कर लेती है। वह सिर्फ सुधार का बैनर लिए चौक-चौराहे पर खड़ी हो जाती है ताकि लोगों को पता चल सके कि कुछ हो रहा है। पता नहीं, परिवर्तन लाने की जिद्द कब आएगी? यही देखकर लगता है कि यथास्थितिवाद की परिधि से बाहर जाना किसी को भी पसंद नहीं है।
रोटी को जुटाने के लिए मजदूर मारे-मारे फिरते हैं। उनके जीवन पर इतना भारी दवाब है कि अक्सर दूसरों के मोहताज हो जाते हैं। लेकिन उनपर किसी का ध्यान नहीं जाता है। गांवों में आज भी सामंती नगाड़े बजते हैं और उसकी ताल पर मजदूरों को नाचना होता है। वे भागकर शहर आते हैं लेकिन यहां एक दूसरी दुनिया से पाला पड़ता है। उपेक्षा, संवेदनहीनता और अमानवीयता को देखकर उन्हें बार-बार लगता है कि वे हर जगह से हाँके जा रहे हैं और कहीं सुरक्षित भी नहीं हैं। लेकिन कोरोना ने उन्हें ऊंगली पकड़कर समझा दिया कि जीवन का सच क्या है।     
--- आनंद भारती





एक तर-बतर शिनाख्त  
तुम्हारे हाथ पत्थरों जैसे मजबूत,
जेलखानों की धुनों जैसे उदास
बोझा खींचनेवाले जानवरों जैसे भारी-भरकम,

मजदूरों का इससे बेहतर परिचय और क्या हो सकता है! यह परिचय कराया है तुर्की के महान कवि नाज़िम हिकमत ने। हिंदी में यह अनुवाद किया है सुरेश सलिल ने। कविता थोड़ी बड़ी है लेकिन भारत में कोरोना के कारण जो हड़बोंग मचा, यह अंश ही पूरी स्थिति के विश्लेषण के लिए काफी है। यह इसलिए भी कि हम हमेशा भगवानों, शास्त्रों, महापुरुषों, संतों, उनके वचनों को अपने साथ लिए चलते हैं। अगर जीवन का भी मतलब समझना-समझाना हो तो हम उन्हीं के उद्धरणों का सहारा लेते हैं। ऐसा लगता है कि हमारा होना हम पर निर्भर है ही नहीं। यह हमारे खुद के लिए भी आश्चर्य का विषय है कि हम अपना परिचय या अपना सच भी किसी दूसरे से ही पूछते हैं।
  
यह कोई आज की बात नहीं है, हजारों वर्षों से यह सिलसिला चल रहा है। यह सवाल बुद्ध और महावीर से भी पूछा गया कि कौन सा उपाय है सत्य से साक्षात्कार का और किस रास्ते से होंगे आत्म-दर्शन? महावीर ने संक्षिप्त सा उत्तर दिया, अपने से खोजो सत्य को। केवल अपने में ही हो सकेंगे आत्मा और परमात्मा के दर्शन। तुम केवल अपने माध्यम से पहुंच सकोगे अपने तक। धर्म, शास्त्र और परम्पराएं मात्र संकेत करते हैं।       

आप इसे अतिशियोक्ति कह सकते हैं लेकिन इस सच से इंकार नहीं कर सकते कि कोरोना  ने जीवन-मृत्यु का रहस्यमय खेल खेलते हुए हर किसी को जीने का महत्व समझा दिया। यहां तक कि उसने समाज के सबसे उपेक्षित समूह, मजदूरों, को भी खुद को पहचानने का अवसर मुहैया करा दिया। जिस आत्मदृष्टि की बात शास्त्र और संत न जाने कब से करते रहे हैं, उसे एक वायरस ने पलक झपकते साकार कर दिया। शायद यही वज़ह है कि अबतक गुलामी को ढो रहे मजदूरों ने पहली बार खुद के बारे में कोई फैसला किया। भय से हो या असुरक्षा के कारण, वे सैकड़ों मील पैदल चलकर अपने गांव जाने के लिए बेताब हो गए। संभव है कि इसके पीछे अफवाहों की साजिश हो। यह भी हो सकता कि हर किसी ने अपनी-अपनी राजनीति रची हो। लेकिन आप इस सच से आंखें नहीं मूंद सकते कि मजदूरों ने पूरी व्यवस्था को घुटने के बल पर ला दिया। बिल्डरों और उद्यमियों-व्यापारियों ही नहीं, विकास-भवनों और फुटपाथों के चेहरे पर पसीने की बूंदें ला दी। यह सोचने के लिए मजबूर कर दिया कि मजदूर चले गए तो क्या होगा?
साधारण भाषा में कहें या क्लासिक में, मजदूर उनको ही कहा जाता है, जिनके पास अपने श्रम बेचने के सिवा जीविकोपार्जन का कोई साधन न हो। पहले वे खेती के अलावे बुनकर, लोहार, कुम्हार, चर्मकार आदि के रूप में न केवल अपनी रोजी-रोटी जुटाते बल्कि समाज की जरुरतें भी पूरी करते थे। लेकिन जब विकास की अंग्रेजकालीन हवा चली तो बड़े उद्योग-कल कारखाने सबसे ऊपर हो गए। यह जरुरी भी था। लेकिन मुश्किल यह हुई कि कल कारखानों के चक्कर में छोटे-छोटे ग्रामीण उद्योग खत्म होने लगे। खासकर हिंदी क्षेत्र को इसका ज्यादा खामियाजा भुगतना पड़ा। कमाई के लिए मजदूरों को शहरों की तरफ रुख करना पड़ा। तब बंबई (मुंबई), कोलकाता (कलकत्ता), कानपुर सबसे बड़ा हब बना। पिछले कुछ वर्षों में दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, तमिलनाडु, गुजरात, राजस्थान और असम आदि राज्य भी उनके आश्रयस्थल बन गए।
लेकिन हैरानी इस बात की है कि इन प्रदेशों के विकास को देखने के बावजूद बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा जैसे गरीब प्रदेशों के राजनीतिक-शासकों की नींद नहीं खुली। या तो उन्हें अपने कामगारों की चिंता नहीं है या विकास का अपना कोई सपना ही नहीं है। अगर होता तो श्रमिकों के पलायन की नौबत ही क्यों आती? उनके यहां जो पहले उद्योग के जाल बिछे हुए थे, वे अभी तक चल रहे होते।     
श्रमिकों की हालत उन पंछियों की तरह हो गयी है, जो बिना प्रवास किए अपना जीवन नहीं जी सकते। वे बिल्डिंग, हाईवे, रेल लाईन, मेट्रो, बांध, पुल-निर्माण की तरफ देखने के अभ्यासी हो गए हैं। ये सारी चीजें उनके जीने के उपादान हैं। इसके लिए वे अपने घर-परिवार, गांव-जवार, प्रदेश की सरहदों को लांघने में देर नहीं लगाते। एक के जाने की खबर होती है कि उसके पीछे बाकी लोग भी चल पड़ते हैं। जहां काम दीख जाता है, वहीं पैर जमा  देते हैं। दिन-महीना-साल भूलकर परिवार की खुशहाली के लिए पसीना बहाने लगते हैं। देश के विकास में वे भी योगदान दे रहे हैं, यह बताने की बजाए उन्हें सिर्फ समझाया जाता रहा है कि जितना ज्यादा काम करोगे, उतना ही ज्यादा पैसा कमाओगे। लेकिन कोरोना ने समझा दिया कि उन्हें कोल्हू के बैल की तरह आंखों पर पट्टी बांधकर घुमाया जा रहा है। अनगिनत मजदूरों ने देखा कि उनके एक ना से कैसे देश की पूरी अर्थ-व्यवस्था की शक्ल मरुभूमि में तब्दील हो गयी।    
यह सवाल पहले भी था, आज भी है कि उनके राज्यों की सरकारें कभी उन्हें पलायन से रोकने का प्रयास क्यों नहीं करती हैं? इसका सीधा उत्तर है कि तब उन्हें रोजगार देना होगा। रोजगार नहीं मिलने पर असंतोष पैदा होगा। बेरोजगारों की फौज पहले से ही मौजूद है जो हर आए दिन राजधानी की सड़कों को रौंद रही है। सरकारी विभाग, स्कूल-कॉलेज, पुलिस, अस्पताल में लोग चाहिए लेकिन सरकारें पैसे का रोना रो रही हैं। इसलिए उन सरकारों के पास एक ही विकल्प है कि जो लोग बाहर जाना चाहते हैं, वे जाएं। अफसर उन्हें यह बुद्धि देने के लिए तैयार ही मिलते हैं कि बाहर से कमाकर ये मजदूर राज्य का ही फायदा पहुंचाते हैं। यह जो नीति है, इसने समाज के एक बड़े हिस्से को घड़ी का पेंडुलम बना दिया है। इसी ने छोटे किसानों और मजदूरों को हमेशा कंगाल बनाए रखा है।  
इस सच से कौन इंकार कर सकता है कि खेती कभी भी आमदनी की गारंटी नहीं रही है। खेती से लागत खर्च का भी निकलना कभी-कभी मुश्किल हो जाता है। यही वज़ह है कि छोटे किसान खेती से ज्यादा बनिहारी और मजदूरी को ज्यादा लाभकारी मानते रहे हैं। मनरेगा से लाभ तो हुआ लेकिन दिक्कत यह है कि वह साल भर तक रोजगार नहीं देता है। इसलिए लोग बाहर का रुख कर लेते हैं। परिवार सुखी रहे, यह उनका सपना होता है। इसी सपने को पूरा करने के लिए वे अपने घरों को पीछे छोड़ आते हैं। लेकिन इस बार लॉक डाउन यह अहसास दिलाने में कामयाब रहा कि बे-घर होना कितना बड़ा दुख है। यह भी समझा दिया कि तुम्हारे बिना विकास का कोई भी कार्य न शुरु होगा और न पूरा। इसलिए अपनी कीमत पहचानो और आंखें खोलकर दुनिया के साथ-साथ खुद को भी देखो।
वे काम पर लौटेंगे या नहीं, इस सवाल पर सबके अलग-अलग मत हैं लेकिन लॉक डाउन का निचोड़ यह है कि इन मजदूरों के जीवन की परवाह अगर सही मायने में होती तो ये अपना सब गंवा कर भाग नहीं रहे होते। हालांकि जहां-तहां इन मजदूरों को सुविधाओं का लालच देकर रोकने की कोशिश की गई लेकिन वे एक ही रट लगाते रहे कि एक बार अपने गांव जाना चाहते हैं।
गांव लौटने की जो यह नई चेतना है, यह कौन सा रूप लेगी, कुछ स्पष्ट नहीं है। लेकिन उन्हें इतनी समझ तो आ ही गयी कि वे हमेशा अंधेरे में हाँके जाते रहे हैं। उन्हें न तो कभी रास्ते का पता चला और न गंतव्य का। लेकिन अब जगह-जगह से जो संकेत आ रहे हैं, वे नए समय के दरवाजे पर दस्तक जैसे हैं। लेकिन मुश्किल यह है कि इन मजदूरों का कोई संगठन नहीं है जो उनकी इस सोच को जन-संघर्ष में बदल सके या अपने श्रम का उचित कीमत वसूल कर सके।
हालांकि गांवों को समझने वाले विशेषज्ञों का मत है कि कोरोना-भय के खत्म होने के बाद मजदूर एक बार फिर लौटेंगे। ऐसे बहुत सारे लोग हैं जिन्होंने परदेस को अपना स्थायी ठिकाना बना लिया है। वे खुद लौटेंगे। उन्हें लाने के लिए सरकारों, बिल्डरों और कारखानेदारों की ओर से कोशिश भी शुरु हो गयी है। जो लोग रह जाएंगे, उनके बारे में कहा जा रहा है कि आगे चलकर उनके सामने एक समस्या पैदा होगी कि वे अपने गांव में करेंगे क्या? वे दूसरों के ही मोहताज होंगे।
बाहर से वे चाहे जितना कमा कर ले आएं, गांवों में आज भी उन्हें पुरानेपन के साथ ही रहना पड़ता है। उनका सिर उठाकर चलना आज भी दबंगों को बर्दाश्त नहीं होता है। वैसे प्रवास में भी एक दूसरी दुनिया से पाला पड़ता है। उपेक्षा, संवेदनहीनता और अमानवीयता को देखकर उन्हें बार-बार लगता है कि वे हर जगह से हाँके जा रहे हैं और कहीं सुरक्षित भी नहीं हैं।
... आनंद भारती



रविवार, 25 दिसंबर 2016

खुश होना भी अगर रोग हो जाये तो कितना अच्छा




दिल्ली के सराय काले खां स्थित मानव मंदिर आश्रम के लॉन में आश्रम में पल रहे 35-40 बच्चों के बीच एक तीन साल का बच्चा फुदक-फुदक कर खेल रहा था. मुझे लगा कि आज एक नया सदस्य आ गया है. फिर लगा कि इतनी कम उम्र के बच्चे का प्रवेश तो नहीं होता है फिर यह यहां कैसे? अगले ही पल किनारे खड़े एक जवान जोड़ी पर नज़र गयी जो उस बच्चे को एकटक देखे जा रही थी. दोनों 30-32 से ज्यादे के नहीं होंगे. तब एक आशंका मन में पैदा हो गयी कि दोनों जॉब में होंगे, शायद बच्चा अनचाहे ढंग से धरती पर आ गया होगा इसलिये अपना भार समझकर आश्रम को सौंपने आ गये होंगे. आधुनिक समय की यही पहचान तो है कि अपनी खुशी के लिये बाकियों की खुशियों को नीलाम करते रहो.
मुझे देखकर मेरे परिचित आश्रम के सभी लड़के-लड़कियां नमस्ते करने एक-एक कर आते रहे. किनारे खड़ी जोड़ी उन बच्चों गौर से निहारती रही और आपस में बुदबुदाती भी रही. वह छोटा बच्चा भी देखा देखी मेरे पास आ गया और नकल उतारते हुए अपने दोनों हाथ जोड़ लिया. मैंने प्यार से उसका नाम पूछा तो वह जवाब दिये बिना खेलने में मस्त हो गया. तभी दौड़ लगाते हुए वह बच्चा किसी से टकराकर गिर गया. वह जोड़ी चिंतित मुद्रा में दौड़ पड़ी और जबतक उसे उठाने की कोशिश करती, वह बच्चा खिलखिलाता हुआ खुद खड़ा हो गया. दोनों के चेहरे पर लंबी मुस्कान तैर गयी. अच्छा हुआ कि वहां हरी घास थी, अगर पक्की जगह पर गिरता तो चोट जरुर लग जाती. मैं अब तक उस बच्चे को लेकर किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पाया था, तभी वहां आश्रम के व्यवस्थापक फरीद आ गये. उनसे पता चला कि इस बच्चे का आज जन्मदिन है. इसके माता-पिता पैसे वाले हैं लेकिन किसी होटल में बर्थ डे मनाने के बजाय आश्रम में आ गये ताकि अपने घर-परिवार से अनजान या किसी मजबूरी के तहत आश्रम में पल रहे बच्चों के साथ खुशी को शेयर किया जा सके.
आधुनिक समाज की इस जोड़ी के बारे में मेरे अंदर जो आशंका पनपी थी, वह शर्मशार हो गयी. मुझे अपनी सोच पर अफसोस हुआ. लगा किसी के बारे में बिना जाने-परखे गलत धारणा बनाना भी एक अपराध ही है. जोड़ी पति-पत्नी से की तरफ मैंने परिचय का हाथ बढ़ाया. दोनों ने खुलकर बात की. बताया कि इस आश्रम के बारे में नेट से पता चला और यहां की गतिविधियों ने हम दोनों को सम्मोहित ही नहीं किया, हमें यहां आने को प्रेरित भी किया. तभी सोच लिया था कि अपने बेटे का बर्थ डे यहीं मनायेंगे. जो खुशी हमारे बेटे को यहां मिल रही है, वह और कहीं नहीं मिल पाती. सच बात तो यह है कि पहले हमने अपने बच्चे की खुशी के बारे में ही सोचा था, लेकिन इन सारे बच्चों की खुशियां भी हमारे हिस्से आ गयीं. यहीं केक काटा. जो भी खाने को लाया था, आपस में बांटकर खाया. आश्रम के सारे लड़के-लड़कियां इसके दोस्त बन गये हैं. घंटे भर से बेटे को मना रहा हूं लेकिन बच्चों का साथ छोड़ने के लिये तैयार नहीं है.
यह इस नौजवान पीढ़ी की नयी सोच नहीं तो और क्या है? जिस पीढ़ी पर लगातार अराजक और कर्तव्यहीन होने के आरोप लगते रहते हैं, उसका यह चेहरा कितने लोग देख पाते हैं. अपनी खुशी में सबको शामिल करने और सबको खुश देखकर खुद खुश होने की यह इच्छा अगर रोग में बदल जाये तो कितना अच्छा लगेगा.
---आनंद भारती