शनिवार, 13 जून 2020


एक तर-बतर शिनाख्त  
तुम्हारे हाथ पत्थरों जैसे मजबूत,
जेलखानों की धुनों जैसे उदास
बोझा खींचनेवाले जानवरों जैसे भारी-भरकम,

मजदूरों का इससे बेहतर परिचय और क्या हो सकता है! यह परिचय कराया है तुर्की के महान कवि नाज़िम हिकमत ने। हिंदी में यह अनुवाद किया है सुरेश सलिल ने। कविता थोड़ी बड़ी है लेकिन भारत में कोरोना के कारण जो हड़बोंग मचा, यह अंश ही पूरी स्थिति के विश्लेषण के लिए काफी है। यह इसलिए भी कि हम हमेशा भगवानों, शास्त्रों, महापुरुषों, संतों, उनके वचनों को अपने साथ लिए चलते हैं। अगर जीवन का भी मतलब समझना-समझाना हो तो हम उन्हीं के उद्धरणों का सहारा लेते हैं। ऐसा लगता है कि हमारा होना हम पर निर्भर है ही नहीं। यह हमारे खुद के लिए भी आश्चर्य का विषय है कि हम अपना परिचय या अपना सच भी किसी दूसरे से ही पूछते हैं।
  
यह कोई आज की बात नहीं है, हजारों वर्षों से यह सिलसिला चल रहा है। यह सवाल बुद्ध और महावीर से भी पूछा गया कि कौन सा उपाय है सत्य से साक्षात्कार का और किस रास्ते से होंगे आत्म-दर्शन? महावीर ने संक्षिप्त सा उत्तर दिया, अपने से खोजो सत्य को। केवल अपने में ही हो सकेंगे आत्मा और परमात्मा के दर्शन। तुम केवल अपने माध्यम से पहुंच सकोगे अपने तक। धर्म, शास्त्र और परम्पराएं मात्र संकेत करते हैं।       

आप इसे अतिशियोक्ति कह सकते हैं लेकिन इस सच से इंकार नहीं कर सकते कि कोरोना  ने जीवन-मृत्यु का रहस्यमय खेल खेलते हुए हर किसी को जीने का महत्व समझा दिया। यहां तक कि उसने समाज के सबसे उपेक्षित समूह, मजदूरों, को भी खुद को पहचानने का अवसर मुहैया करा दिया। जिस आत्मदृष्टि की बात शास्त्र और संत न जाने कब से करते रहे हैं, उसे एक वायरस ने पलक झपकते साकार कर दिया। शायद यही वज़ह है कि अबतक गुलामी को ढो रहे मजदूरों ने पहली बार खुद के बारे में कोई फैसला किया। भय से हो या असुरक्षा के कारण, वे सैकड़ों मील पैदल चलकर अपने गांव जाने के लिए बेताब हो गए। संभव है कि इसके पीछे अफवाहों की साजिश हो। यह भी हो सकता कि हर किसी ने अपनी-अपनी राजनीति रची हो। लेकिन आप इस सच से आंखें नहीं मूंद सकते कि मजदूरों ने पूरी व्यवस्था को घुटने के बल पर ला दिया। बिल्डरों और उद्यमियों-व्यापारियों ही नहीं, विकास-भवनों और फुटपाथों के चेहरे पर पसीने की बूंदें ला दी। यह सोचने के लिए मजबूर कर दिया कि मजदूर चले गए तो क्या होगा?
साधारण भाषा में कहें या क्लासिक में, मजदूर उनको ही कहा जाता है, जिनके पास अपने श्रम बेचने के सिवा जीविकोपार्जन का कोई साधन न हो। पहले वे खेती के अलावे बुनकर, लोहार, कुम्हार, चर्मकार आदि के रूप में न केवल अपनी रोजी-रोटी जुटाते बल्कि समाज की जरुरतें भी पूरी करते थे। लेकिन जब विकास की अंग्रेजकालीन हवा चली तो बड़े उद्योग-कल कारखाने सबसे ऊपर हो गए। यह जरुरी भी था। लेकिन मुश्किल यह हुई कि कल कारखानों के चक्कर में छोटे-छोटे ग्रामीण उद्योग खत्म होने लगे। खासकर हिंदी क्षेत्र को इसका ज्यादा खामियाजा भुगतना पड़ा। कमाई के लिए मजदूरों को शहरों की तरफ रुख करना पड़ा। तब बंबई (मुंबई), कोलकाता (कलकत्ता), कानपुर सबसे बड़ा हब बना। पिछले कुछ वर्षों में दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, तमिलनाडु, गुजरात, राजस्थान और असम आदि राज्य भी उनके आश्रयस्थल बन गए।
लेकिन हैरानी इस बात की है कि इन प्रदेशों के विकास को देखने के बावजूद बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा जैसे गरीब प्रदेशों के राजनीतिक-शासकों की नींद नहीं खुली। या तो उन्हें अपने कामगारों की चिंता नहीं है या विकास का अपना कोई सपना ही नहीं है। अगर होता तो श्रमिकों के पलायन की नौबत ही क्यों आती? उनके यहां जो पहले उद्योग के जाल बिछे हुए थे, वे अभी तक चल रहे होते।     
श्रमिकों की हालत उन पंछियों की तरह हो गयी है, जो बिना प्रवास किए अपना जीवन नहीं जी सकते। वे बिल्डिंग, हाईवे, रेल लाईन, मेट्रो, बांध, पुल-निर्माण की तरफ देखने के अभ्यासी हो गए हैं। ये सारी चीजें उनके जीने के उपादान हैं। इसके लिए वे अपने घर-परिवार, गांव-जवार, प्रदेश की सरहदों को लांघने में देर नहीं लगाते। एक के जाने की खबर होती है कि उसके पीछे बाकी लोग भी चल पड़ते हैं। जहां काम दीख जाता है, वहीं पैर जमा  देते हैं। दिन-महीना-साल भूलकर परिवार की खुशहाली के लिए पसीना बहाने लगते हैं। देश के विकास में वे भी योगदान दे रहे हैं, यह बताने की बजाए उन्हें सिर्फ समझाया जाता रहा है कि जितना ज्यादा काम करोगे, उतना ही ज्यादा पैसा कमाओगे। लेकिन कोरोना ने समझा दिया कि उन्हें कोल्हू के बैल की तरह आंखों पर पट्टी बांधकर घुमाया जा रहा है। अनगिनत मजदूरों ने देखा कि उनके एक ना से कैसे देश की पूरी अर्थ-व्यवस्था की शक्ल मरुभूमि में तब्दील हो गयी।    
यह सवाल पहले भी था, आज भी है कि उनके राज्यों की सरकारें कभी उन्हें पलायन से रोकने का प्रयास क्यों नहीं करती हैं? इसका सीधा उत्तर है कि तब उन्हें रोजगार देना होगा। रोजगार नहीं मिलने पर असंतोष पैदा होगा। बेरोजगारों की फौज पहले से ही मौजूद है जो हर आए दिन राजधानी की सड़कों को रौंद रही है। सरकारी विभाग, स्कूल-कॉलेज, पुलिस, अस्पताल में लोग चाहिए लेकिन सरकारें पैसे का रोना रो रही हैं। इसलिए उन सरकारों के पास एक ही विकल्प है कि जो लोग बाहर जाना चाहते हैं, वे जाएं। अफसर उन्हें यह बुद्धि देने के लिए तैयार ही मिलते हैं कि बाहर से कमाकर ये मजदूर राज्य का ही फायदा पहुंचाते हैं। यह जो नीति है, इसने समाज के एक बड़े हिस्से को घड़ी का पेंडुलम बना दिया है। इसी ने छोटे किसानों और मजदूरों को हमेशा कंगाल बनाए रखा है।  
इस सच से कौन इंकार कर सकता है कि खेती कभी भी आमदनी की गारंटी नहीं रही है। खेती से लागत खर्च का भी निकलना कभी-कभी मुश्किल हो जाता है। यही वज़ह है कि छोटे किसान खेती से ज्यादा बनिहारी और मजदूरी को ज्यादा लाभकारी मानते रहे हैं। मनरेगा से लाभ तो हुआ लेकिन दिक्कत यह है कि वह साल भर तक रोजगार नहीं देता है। इसलिए लोग बाहर का रुख कर लेते हैं। परिवार सुखी रहे, यह उनका सपना होता है। इसी सपने को पूरा करने के लिए वे अपने घरों को पीछे छोड़ आते हैं। लेकिन इस बार लॉक डाउन यह अहसास दिलाने में कामयाब रहा कि बे-घर होना कितना बड़ा दुख है। यह भी समझा दिया कि तुम्हारे बिना विकास का कोई भी कार्य न शुरु होगा और न पूरा। इसलिए अपनी कीमत पहचानो और आंखें खोलकर दुनिया के साथ-साथ खुद को भी देखो।
वे काम पर लौटेंगे या नहीं, इस सवाल पर सबके अलग-अलग मत हैं लेकिन लॉक डाउन का निचोड़ यह है कि इन मजदूरों के जीवन की परवाह अगर सही मायने में होती तो ये अपना सब गंवा कर भाग नहीं रहे होते। हालांकि जहां-तहां इन मजदूरों को सुविधाओं का लालच देकर रोकने की कोशिश की गई लेकिन वे एक ही रट लगाते रहे कि एक बार अपने गांव जाना चाहते हैं।
गांव लौटने की जो यह नई चेतना है, यह कौन सा रूप लेगी, कुछ स्पष्ट नहीं है। लेकिन उन्हें इतनी समझ तो आ ही गयी कि वे हमेशा अंधेरे में हाँके जाते रहे हैं। उन्हें न तो कभी रास्ते का पता चला और न गंतव्य का। लेकिन अब जगह-जगह से जो संकेत आ रहे हैं, वे नए समय के दरवाजे पर दस्तक जैसे हैं। लेकिन मुश्किल यह है कि इन मजदूरों का कोई संगठन नहीं है जो उनकी इस सोच को जन-संघर्ष में बदल सके या अपने श्रम का उचित कीमत वसूल कर सके।
हालांकि गांवों को समझने वाले विशेषज्ञों का मत है कि कोरोना-भय के खत्म होने के बाद मजदूर एक बार फिर लौटेंगे। ऐसे बहुत सारे लोग हैं जिन्होंने परदेस को अपना स्थायी ठिकाना बना लिया है। वे खुद लौटेंगे। उन्हें लाने के लिए सरकारों, बिल्डरों और कारखानेदारों की ओर से कोशिश भी शुरु हो गयी है। जो लोग रह जाएंगे, उनके बारे में कहा जा रहा है कि आगे चलकर उनके सामने एक समस्या पैदा होगी कि वे अपने गांव में करेंगे क्या? वे दूसरों के ही मोहताज होंगे।
बाहर से वे चाहे जितना कमा कर ले आएं, गांवों में आज भी उन्हें पुरानेपन के साथ ही रहना पड़ता है। उनका सिर उठाकर चलना आज भी दबंगों को बर्दाश्त नहीं होता है। वैसे प्रवास में भी एक दूसरी दुनिया से पाला पड़ता है। उपेक्षा, संवेदनहीनता और अमानवीयता को देखकर उन्हें बार-बार लगता है कि वे हर जगह से हाँके जा रहे हैं और कहीं सुरक्षित भी नहीं हैं।
... आनंद भारती



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