दिल्ली
के सराय काले खां स्थित मानव मंदिर आश्रम के लॉन में आश्रम में पल रहे 35-40
बच्चों के बीच एक तीन साल का बच्चा फुदक-फुदक कर खेल रहा था. मुझे लगा कि आज एक
नया सदस्य आ गया है. फिर लगा कि इतनी कम उम्र के बच्चे का प्रवेश तो नहीं होता है
फिर यह यहां कैसे? अगले ही पल किनारे खड़े एक जवान जोड़ी पर
नज़र गयी जो उस बच्चे को एकटक देखे जा रही थी. दोनों 30-32 से ज्यादे के नहीं
होंगे. तब एक आशंका मन में पैदा हो गयी कि दोनों जॉब में होंगे, शायद बच्चा अनचाहे ढंग से धरती पर आ गया होगा इसलिये अपना
भार समझकर आश्रम को सौंपने आ गये होंगे. आधुनिक समय की यही पहचान तो है कि अपनी
खुशी के लिये बाकियों की खुशियों को नीलाम करते रहो.
मुझे
देखकर मेरे परिचित आश्रम के सभी लड़के-लड़कियां नमस्ते करने एक-एक कर आते रहे.
किनारे खड़ी जोड़ी उन बच्चों गौर से निहारती रही और आपस में बुदबुदाती भी रही. वह
छोटा बच्चा भी देखा देखी मेरे पास आ गया और नकल उतारते हुए अपने दोनों हाथ जोड़
लिया. मैंने प्यार से उसका नाम पूछा तो वह जवाब दिये बिना खेलने में मस्त हो गया.
तभी दौड़ लगाते हुए वह बच्चा किसी से टकराकर गिर गया. वह जोड़ी चिंतित मुद्रा में
दौड़ पड़ी और जबतक उसे उठाने की कोशिश करती, वह बच्चा खिलखिलाता हुआ खुद
खड़ा हो गया. दोनों के चेहरे पर लंबी मुस्कान तैर गयी. अच्छा हुआ कि वहां हरी घास
थी, अगर पक्की जगह पर गिरता तो चोट जरुर लग जाती. मैं अब तक उस
बच्चे को लेकर किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पाया था, तभी वहां आश्रम के व्यवस्थापक
फरीद आ गये. उनसे पता चला कि इस बच्चे का आज जन्मदिन है. इसके माता-पिता पैसे वाले
हैं लेकिन किसी होटल में बर्थ डे मनाने के बजाय आश्रम में आ गये ताकि अपने
घर-परिवार से अनजान या किसी मजबूरी के तहत आश्रम में पल रहे बच्चों के साथ खुशी को
शेयर किया जा सके.
आधुनिक
समाज की इस जोड़ी के बारे में मेरे अंदर जो आशंका पनपी थी, वह शर्मशार हो गयी. मुझे अपनी सोच पर अफसोस हुआ. लगा किसी
के बारे में बिना जाने-परखे गलत धारणा बनाना भी एक अपराध ही है. जोड़ी पति-पत्नी से
की तरफ मैंने परिचय का हाथ बढ़ाया. दोनों ने खुलकर बात की. बताया कि ‘इस
आश्रम के बारे में नेट से पता चला और यहां की गतिविधियों ने हम दोनों को सम्मोहित
ही नहीं किया, हमें यहां आने को प्रेरित भी किया. तभी
सोच लिया था कि अपने बेटे का बर्थ डे यहीं मनायेंगे. जो खुशी हमारे बेटे को यहां
मिल रही है, वह और कहीं नहीं मिल पाती. सच बात तो यह
है कि पहले हमने अपने बच्चे की खुशी के बारे में ही सोचा था, लेकिन इन सारे बच्चों की खुशियां भी हमारे हिस्से आ गयीं.
यहीं केक काटा. जो भी खाने को लाया था, आपस
में बांटकर खाया. आश्रम के सारे लड़के-लड़कियां इसके दोस्त बन गये हैं. घंटे भर से
बेटे को मना रहा हूं लेकिन बच्चों का साथ छोड़ने के लिये तैयार नहीं है.’
यह
इस नौजवान पीढ़ी की नयी सोच नहीं तो और क्या है? जिस पीढ़ी पर लगातार अराजक और
कर्तव्यहीन होने के आरोप लगते रहते हैं, उसका यह चेहरा कितने लोग देख
पाते हैं. अपनी खुशी में सबको शामिल करने और सबको खुश देखकर खुद खुश होने की यह
इच्छा अगर ‘रोग’ में बदल जाये तो कितना अच्छा
लगेगा.
---आनंद भारती
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