दुनिया मेरे आगे / आनंद भारती
समझ की सीढियां
किसी भी बात को समझाने का हर किसी के पास अलग-अलग तरीका होता है। उसे पक्का भरोसा होता है कि वह समझाने में सफल होगा। लेकिन अक्सर ऐसा होता है कि स्कूल-कॉलेजों में छात्र किसी टीचर को तुरंत फ़ॉलो कर लेते हैं और किसी-किसी के क्लास में पल भर भी मन नहीं लगा पाते हैं। बचपन में गांव में मास्टर जी ना-समझ बच्चों को बाला खींचकर थप्पड़ मारते थे। तब कहा जाता था कि बुद्धि बाल के नीचे होती है। बाल खींचने से जब तकलीफ होगी तो सोई बुद्धि की नींद टूटेगी।
इसका दूसरा पक्ष यह भी है कि अगर कोई समझने के लिए ही तैयार न हो तो उसका क्या करें। यह भी हो सकता है कि उसका दिमाग इतना कुंद हो कि कितना भी समझाओ उसकी समझ में नहीं आता हो। समाज में इसे लेकर अलग-अलग मान्यता है कि लोग प्यार की नहीं, जबरदस्ती की भाषा समझते हैं। कोई कहेगा उसे सिर्फ डंडे की भाषा समझ में आती है या कहेंगे उसे क़ानून की नहीं, थर्ड डिग्री की भाषा समझाओ, तभी समझ पाएगा। कोई किसी बात को अगर तुरंत कैच कर लेता है तो कहा जाता है कि इसका आइन्स्टीन जैसा दिमाग है और जो अपना सर खुजलाने लगता है उसे तत्काल ‘गोबरदास’ की उपाधि मिल जाती है। ऐसे लोगों के लिए एक मजाक भी है कि चुटकुला सुनने के बाद गधे को अगले दिन हंसी आती है। यानी इस मामले में भी हर किसी की समझ अलग-अलग है। जितने मुंह उतनी बातें।
गांव में मेरे गाडीवान थे लसंतु चाचा। उन्हें किसी भी बात को समझने में काफी वक्त लग जाता था। लेकिन उनके पास किस्से-कहानियों का खजाना होता था। हमलोग बैलगाड़ी से ही कहीं जाते-आते थे। वही यातायात का एकमात्र साधन थी। लासंतु चाचा किस्सों का पिटारा खोल देते थे और हमारा रास्ता आसानी से कट जाता था। हमने एक बार उनसे पूछा कि इतनी कहानियां आप याद कर लेते हैं लेकिन किसी की बात समझने में देर क्यों लगती है? तो कहा, एक बार स्कूल में मास्टर जी ने कान पर जोर का थप्पर मार दिया था, जिससे कान का चदरा फट गया। उसी के बाद से सुनने में दिक्कत होने लगी और दिमाग भी भोथा हो गया। अगर नहीं मारे होते तो हम भी पढ़-लिखकर समझदार हो गए होते, यह गाड़ीवानी का काम तो नहीं करते। लासंतु चाचा समझ की बात कर रहे थे लेकिन उन्हें इसका भान नहीं था। वे आज अगर होते तो मैं उन्हें यह समझा पाता कि फणीश्वरनाथ रेणु अपनी जिस मुहावरेदार भाषा के धनी बने, वह उन्होंने अपने गाड़ीवान से ही सुनकर जाना था।
पिछले दिनों मुंबई के जहांगीर आर्ट गैलरी में एक पेंटिंग्स प्रदर्शनी देखने गया। सुमित मिश्रा की थी, जो इस समय सिनेमा-टीवी के बड़े आर्ट डायरेक्टर हैं। उन्होंने एक फिल्म का भी निर्देशन किया है, ‘अमृता और मैं’। अमृता प्रीतम और इमरोज की प्रेम कहानी पर बनी यह फिल्म अभी तक एक दर्जन से भी ज्यादा अवार्ड हासिल कर चुकी है। उस प्रदर्शनी को देखकर मैं बाहर निकला था। लेकिन भारी बारिश के कारण पोर्टिको में खडा हो गया। वहीं बिहार से आए कुछ पर्यटक भी थे जो गेट वे ऑफ़ इंडिया को देखकर लौट रहे थे। मेरे हाथ में एक्जीविशन का ब्रोशर था। उसके कवर पर जो चित्र था, उसमें एक आदमी के सिर पर चोटी की जगह पेड़ था। उसका शीर्षक ‘बोधिवृक्ष’ दिया गया था।
मेरे बगल में खड़े दो बच्चे उस चित्र को देखकर हैरानी से मुस्कुरा रहे कि कैसा अजूबा है यह। मेरे कुछ कहने के पहले ही गार्ड ने अन्दर जाकर देखने का इशारा कर दिया। दोनों डरते-हिचकते गए। पीछे-पीछे मैं भी गया। उन्होंने बाकी चित्रों को तो देखा लेकिन ‘बोधिवृक्ष’ वाली पेंटिंग के सामने टिक कर खड़े हो गए। एक ने हैरानी जतायी कि ‘इसके माथे पर गाछ कैसे उग गया है? लगता है कि यह कोई साधु होगा जो ज्ञान के लिए तप करने जंगल गया होगा। भूखे-प्यासे पता नहीं, कितना दिन बीत गया होगा। उसी में पूरे शरीर पर झाड-झंखार उग गया होगा।’ दूसरे ने बताया कि उसके गांव के पास बोधगया में बोधिवृक्ष है, जहां भगवान् बुद्ध को ज्ञान मिला था। वह तो जमीन पर है लेकिन यहां सिर पर क्यों है? इसका मतलब यह है कि जिसका माथा सही रहेगा, उसी को बुद्धि-ज्ञान मिलेगा। फिर दोनों मेरी तरफ मुखातिब हुए थे कुछ जानने के लिए। लेकिन मैं कहीं और देखने का नाटक करने लगा था।
मुझे लगने लगा कि बच्चों की समझ सोशल मीडिया और टीवी चैनलों पर भड़ास निकालने वालों की समझ से बहुत आगे और समझदारी भरी है। वैसे ऐसी समझ अमूमन हर किसी के पास होती है लेकिन आग्रहों-दुराग्रहों के कारण मूल चेतना से भटक जाते हैं। इन बच्चों की तरह अगर हम सही नज़रिए से चीजों को देखना शुरू कर दें तो हमारे आस-पास के माहौल में बदलाव आने लग जाएगा।
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