‘लखपति किसान, स्मार्ट विलेज’
आदिवासी महिलाएं स्मार्ट गांव के सपने को कर रही हैं पूरा
कश्मीर को छोड़कर अगर देश के बाकी हिस्सों की अशांति को कदम-कदम नापने की कोशिश करें तो वे भू-भाग आदिवासी क्षेत्र के ही होंगे। महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडीशा, झारखंड आदि राज्यों के आदिवासी इलाकों में भय और आतंक की खेती पूरी शिद्दत के साथ की जा रही है। इसके सबसे ज्यादा शिकार भी आदिवासी ही हो रहे हैं। उनपर दोहरी मार पड़ रही है। आतंकी संगठनों की अपनी राजनीति है और व्यवस्था की अपनी रणनीति। जल, जंगल और जमीन के मालिक ‘गरीब’ आदिवासी आज भी आदमखोर व्यवस्था से अपने ही संसाधनों के लिए लड़ रहे हैं। हजारों साल पहले भी वे अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे थे और आज भी कर रहे हैं। उसी में से वे अपना रास्ता भी ढूंढते रहे हैं। ऐसा ही रास्ता झारखंड के खूंटी जिले के मोरहू प्रखंड के लोग खोज चुके हैं और बाकी आदिवासी अंचलों को अपनी ओर आकर्षित कर रहे हैं।
समाजशास्त्रियों ने माना है कि हजारों वर्ष पूर्व आदिवासियों ने ही जंगल, पहाड़ एवं पहाड़ की गुफाओं में जीवन सुरक्षित करते हुए ‘विकास’ की नींव रखी। जंगलों को साफ किया और खेती करने की पद्धति इजाद कर एक स्थायी सामाजिक जीवन की शुरुवात की। यही वज़ह है कि वे जल, जंगल और ज़मीन से अलग नहीं रह पाये। आज मोरहू प्रखंड के पांच पंचायतों में 41 गांव के लोग, खासकर स्त्रियां, यह साबित कर रही हैं कि वे श्रम के साथी हैं और किसी के बहकावे में आए बगैर खुद के साथ-साथ समाज को खुशहाल करना चाहती हैं। यह नरेंद्र मोदी सरकार के लिए भी खुशी की खबर है कि आदिवासी महिलाएं उनके स्मार्ट गांव के सपने और संकल्प को साकार कर रही हैं।
खूंटी मुंडा आदिवासियों का इलाका है। मुंडा लोगों का जमीन से जुड़ाव है। हमेशा से वे इसके लिए संघर्ष करते रहे हैं। बिरसा मुंडा ने तो इसके लिए लंबा संघर्ष किया था। उनके आन्दोलन के सामने अंग्रेज सरकार को झुकना पडा था। जमीन को लेकर उन्हें क़ानून बनाना पडा जिसे ‘छोटानागपुर टेनेंसी एक्ट’ का नाम दिया गया। लेकिन दुर्भाग्य कि खूंटी की जमीन किसी का पालन नहीं कर पा रही है। पठारी अंचल के कारण खेती करना मुश्किल है। इस कारण वहां से लोगों का शहरों की ओर पलायन करना एक रूटीन बन गया।
लेकिन तीन साल पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस स्मार्ट गांव की परिकल्पना की, उसे आज बखूबी जमीन पर उतारने का काम मोरहू प्रखंड की महिलाएं कर रही हैं। ढाई हजार आदिवासी परिवार राज्य प्रदत्त सुविधाओं को व्यवस्थित कर एक मुकाम देने की कोशिश में लगे हुए हैं। इसके पीछे की ताकत बना रतन टाटा ट्रस्ट और उसे अंजाम पर पहुंचाने का जिम्मा लिया उस इलाके में सक्रिय संगठन नवजागृति केंद्र ने। महिलाओं को ही आधार बनाकर उसमें महिला-समूहों को जोड़ा गया। उन्हें कृषि के अत्याधुनिक तकनीक और तौर-तरीकों से अवगत कराया गया। मिट्टी रहित पौधा तैयार कर उसे रोपने का सिलसिला शुरू किया गया। ऐसा इसलिए क्योंकि मिट्टी में बीज से पौधा तैयार करने में मिट्टी की बहुत सारी बीमारियां आ जाती हैं। मिट्टी के बदले नारियल के छिलके का डस्ट डालकर पौधा उगाया जाता है। अनुभव में आया कि इससे उत्पादन भी ज्यादा हुआ। टमाटर, हरी मिर्च,गोभी आदि का ऑफ़ सीजन खेती हो रही है और कीमत भी ज्यादा मिल रही है। पहले यहां तरबूज की खेती नहीं होती थी लेकिन अब भारी मात्रा में तरबूज, ककड़ी, कद्दू आदि की फसल उगाई जा रही है। आर्थिक दृष्टि से यह वरदान साबित हो रही है। महिलाएं फलदार वृक्ष की ओर भी उन्मुख हुई हैं जो मुनाफे का बाजार कायम करेगी। सिंचाई की व्यवस्था आधुनिक कर दी गयी है। पांडु गांव में तो सोलर सिस्टम से सिंचाई की जा रही है। कुआं श्रमदान से बनाया गया है।
उस इलाके में पारम्परिक लाह के उत्पादन को बढाने के लिए वैज्ञानिक पद्धति अपनाई गयी। लाह का सबसे ज्यादा इस्तेमाल पेंट बनाने में होता है। उससे बटन भी बनते हैं। लाह की खरीद-बिक्री में पहले बिचौलिए की मन-मर्जी चलती थी लेकिन अब आदिवासियों ने कृषक उत्पाद संगठन (फार्मर्स प्रोड्यूसर्स ओर्गेनाजेशन) बनाकर अपनी व्यवस्था बना ली है। इसमें विभिन्न महिला समितियों की प्रतिनिधि शामिल हैं। अब लाह बेचने किसी को भी बाज़ार नहीं जाना पड़ता है, महाजन ही गांव आने लगे हैं। इंटरनेट पर सक्रियता के कारण महिलाओं को हर चीज का बाज़ार-भाव मालूम रहता है इसलिए ठगी से बच जाती हैं और इन्हें अच्छी कीमत मिल जाती है।
नवजागृति केंद्र के संस्थापक सतीश गिरिजा बताते हैं कि ‘आदिवासियों का जमीन के प्रति लगाव तो शरू से ही रहा है लेकिन तकनीकी जानकारियों के अभाव में कृषि इनके जीवन का आधार नहीं बन पाया था, अब उसमें बदलाव हो रहा है। कृषि को बेहतर रूप देने की कोशिश चल रही है।’ एक प्रमुख महिला जिनित मिंज का खाना है कि ‘सरकार ने हमें सुविधाएं उपलब्ध कराई और हमने उसमें अपना श्रम लगाया। अब हमलोग खुद अपने पैरों पर खड़े हो रहे हैं। हमारी सफलता अब दूसरे क्षेत्रों को प्रेरित कर रही है।’
पहले इस क्षेत्र में कृषि के लिए बैंकों से कर्ज लेने की मंशा और परम्परा नहीं थी लेकिन जानकारियों के बाद समझ में आ गयी है कि कर्ज लेकर खेती को समुन्नत किया जा सकता है। लोग पंचायत से प्राप्त संसाधनों का भी इस्तेमाल कर रहे हैं। मनरेगा भी मददगार बन रहा है। सुअर पालन पहले पारम्परिक तरीके से होता था, अब अच्छे नस्ल के सुअर को बेहतर रख रखाव के साथ पाला जा रहा है। उसके लिए अलग से घर बनाए गए हैं और उसे बाहर नहीं छोड़ा जा रहा है। सुअरों को भूसे और साग तथा सब्जी के छिलके खिलाए जा रहे हैं। एक परिवार को दो सुअर, नर और मादा, उपलब्ध कराए जा रहे हैं। साल में दो बार उसके 12 से 16 बच्चे होते हैं। एक बच्चा ढाई हजार रुपए में बिकता है। यह किसानों की नकदी आमदनी (कैश क्रॉप) है। इन गांवों की सबसे ख़ास बात यह है कि अपनी आमदनी का हिसाब-किताब महिला समूह ही रखता है।
इन गावों को इंटरनेट से जोड़ दिया गया है। इसके लिए ‘इंटरनेट मित्र’ का आरम्भ किया गया है। हर महिला न केवल इसका इस्तेमाल कर रही है बल्कि देश-दुनिया से अपनी तरह से परिचित हो रही है। मनोरंजन के भी पर्याप्त साधन प्राप्त हो गए हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि आधुनिक तकनीक ने उन्हें अपनी परंपरा से काट दिया है बल्कि उन्होंने अपनी भाषा, संस्कृति और सामाजिक परम्पराओं को आधुनिक नज़रिए से देखना शुरू कर दिया है।
इन गांवों में जो प्रोजेक्ट चल रहा है, उसका नाम दिया गया है ‘लखपति किसान, स्मार्ट विलेज’। आर्थिक मजबूती के कारण लोगों के व्यवहार में भी परिवर्तन आ रहा है। झारखंड का अधिकांश हिस्सा नक्सल से प्रभावित है लेकिन यह माना जा रहा है कि जैसे ही लोगों की आमदनी बढ़ेगी और दूसरों पर से निर्भरता ख़त्म होगी, नक्सल का प्रभाव कम होता जाएगा। एक और बड़ी ख़ास बात यह है कि यहां से लोगों के पलायन पर ब्रेक लग रहा है। उल्लेखनीय है कि रोजगार की तलाश में बाहर जाने वालों में सबसे ज्यादा खूंटी की ही लडकियों के आंकड़े हैं। गांवों में बेहतर सुविधाएं हासिल हो रही हैं। आमदनी के कारण पक्के मकान बनाए जा रहे हैं। सरकारी सहयोग से शौचालयों के निर्माण हो रहे हैं। स्वच्छता की जिम्मेदारी स्त्रियां ही देख रही हैं। जिन स्कूलों में शिक्षक नहीं आ रहे थे, वहां की व्यवस्था दुरुस्त कर दी गयी है।
सबसे खुशी की बात यह है कि ग्रामीण विकास मंत्रालय की हैदराबाद स्थित एक विंग राष्ट्रीय ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज संस्थान झारखंड के इन गांवों में दिलचस्पी दिखाई है। वह इसका डाक्यूमेंटेशन कर रहा है ताकि पूरा देश देख सके कि कैसे बदल रहा है गांव।
---आनंद भारती
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